इसके बावजूद, समिति की रिपोर्ट सामने आने के ढाई महीने बाद भी अब तक डॉ. गुप्ता के खिलाफ कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई है। इस देरी को लेकर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि जब समिति ने दस्तावेजों पर संदेह जताया है, तो फिर कार्रवाई में इतनी देर क्यों हो रही है।
विवाद बढ़ने के बीच डॉ. राजेश गुप्ता ने खुद सामने आकर अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनका जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह वैध और सही है, और उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग भी की है, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
सूत्रों के मुताबिक, अब जिला प्रशासन इस पूरे मामले की दोबारा गहन जांच करने की तैयारी में है। साथ ही, संबंधित दस्तावेजों की वैधता और प्रमाणिकता की पुष्टि के लिए उच्च स्तर पर भी विचार-विमर्श चल रहा है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई, जिसमें सेवा समाप्ति और कानूनी कार्यवाही शामिल हो सकती है।
यह मामला सामने आने के बाद एक बार फिर सरकारी नियुक्तियों में दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि मामले में पूरी पारदर्शिता बरती जाएगी और दोषी पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल सभी की नजर आगामी जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है, जो इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।
संवाददाता रुचिका धोटे, भोपाल

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