भारत में लागू गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) को आज 7 साल से अधिक का समय हो चुका है। इसके तहत करदाताओं और व्यापारियों को एकीकृत कर ढांचे के लाभ तो मिले, लेकिन इसके साथ-साथ कई बार तकनीकी त्रुटियाँ और जटिल प्रावधान भी सामने आए। इन्हीं में से एक बड़ा सवाल यह था कि अगर कोई करदाता गलती से जीएसटी गलत टैक्स हेड (जैसे CGST/SGST के स्थान पर IGST या इसके उलट) में जमा कर देता है, तो ऐसी स्थिति में रिफंड की समय-सीमा (Limitation Period) की गणना किस तारीख से होगी?
इस सवाल पर हाल ही में पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसने करदाताओं को राहत दी है और पूरे देश के जीएसटी प्रशासन में स्पष्टता लाई है। इस लेख में हम इस फैसले को विस्तार से समझेंगे—इसके न्यायिक पक्ष, कानूनी आधार, व्यावहारिक प्रभाव और भविष्य की दिशा को गहराई से देखेंगे।
यह मामला M/s Sai Steel बनाम राज्य बिहार (सिविल राइट्स जुरिस्डिक्शन केस नंबर 13163 ऑफ 2024) से संबंधित था।
करदाता ने गलती से गलत हेड में टैक्स जमा किया।
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बाद में उसने सही हेड में राशि जमा की।
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सवाल उठा कि रिफंड क्लेम की अवधि दो साल किस तारीख से गिनी जाएगी—गलत भुगतान की तारीख से या सही भुगतान की तारीख से?
पटना हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिमिटेशन अवधि सही हेड में टैक्स जमा करने की तारीख से शुरू होगी, न कि गलत भुगतान की तारीख से।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह की बेंच ने की।
CGST Act, 2017 की धारा 77 और IGST Act, 2017 की धारा 19 का गहन अध्ययन किया गया।
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न्यायालय ने कहा कि यदि करदाता ने किसी सप्लाई को गलती से इंट्रा-स्टेट मानकर CGST/SGST दे दिया और बाद में वह सप्लाई इंटर-स्टेट निकली, तो उसे IGST भरना होगा और पहले का भुगतान रिफंड योग्य है।
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इसी प्रकार यदि उल्टा हो, तो भी स्थिति वही रहेगी।
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लेकिन रिफंड की समय सीमा तभी से गिनी जाएगी, जब सही भुगतान किया गया हो।
इस निर्णय से पहले कई करदाता असमंजस में थे और कई मामलों में रिफंड क्लेम गलत आधार पर रिजेक्ट कर दिए गए थे।
A. धारा 77 – CGST Act, 2017
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यदि करदाता ने किसी ट्रांजैक्शन को गलती से इन्ट्रा-स्टेट माना और CGST/SGST का भुगतान कर दिया, लेकिन बाद में वह इंटर-स्टेट निकला, तो IGST देय होगा।
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इस स्थिति में पहले का भुगतान रिफंड किया जा सकता है।
B. धारा 19 – IGST Act, 2017
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यदि करदाता ने इसे इंटर-स्टेट मानकर IGST दे दिया, लेकिन बाद में यह इन्ट्रा-स्टेट निकला, तो CGST/SGST जमा करना होगा।
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यहां भी पहले का भुगतान रिफंड योग्य है।
C. नियम 89 (CGST Rules, 2017)
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इसमें रिफंड की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है।
D. सर्कुलर 162/18/2021-GST (25 सितम्बर 2021)
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इसमें यह स्पष्ट किया गया कि रिफंड की समय सीमा सही हेड में भुगतान की तारीख से गिनी जाएगी, न कि गलत हेड में।
E. पहले की स्थिति
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कर विभाग अक्सर कहता था कि समय-सीमा गलत भुगतान की तारीख से शुरू होती है।
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इस कारण हजारों करदाता रिफंड पाने से वंचित हो जाते थे।
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पटना हाई कोर्ट के फैसले ने इस स्थिति को पूरी तरह साफ कर दिया।
व्यापारियों और करदाताओं पर प्रभाव
(i) राहत और पारदर्शिता
इस फैसले से व्यापारियों को बड़ी राहत मिली है। अब उन्हें यह भरोसा है कि यदि उनसे गलती से गलत हेड में टैक्स जमा हो गया है, तो वे सही हेड में भुगतान करने के बाद दो साल के भीतर रिफंड क्लेम कर सकते हैं।
(ii) अनावश्यक मुकदमों में कमी
इस निर्णय से विभाग और करदाताओं के बीच चल रहे हजारों मुकदमों में कमी आने की संभावना है।
(iii) समय पर सुधार की अहमियत
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि करदाता को जल्द से जल्द गलती सुधारनी होगी। देर से सुधार करने पर विवाद उत्पन्न हो सकता है।
(iv) व्यापार जगत पर सकारात्मक असर
जीएसटी जैसे जटिल कर ढांचे में यह फैसला एक सकारात्मक संदेश देता है। इससे व्यापारी समुदाय में विश्वास और स्थिरता बढ़ेगी।
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कर विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगा।
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यह जीएसटी काउंसिल और टैक्स डिपार्टमेंट को भी मजबूर करेगा कि वे अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं में सुधार करें।
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इससे करदाताओं और विभाग के बीच अनावश्यक विवाद कम होंगे।
पटना हाई कोर्ट का यह फैसला अन्य हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट तक भी प्रभाव डाल सकता है।
जीएसटी काउंसिल इस विषय पर एक統ित दिशा-निर्देश जारी करे।
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केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBIC) भी इस पर संशोधित परिपत्र जारी कर सकता है।
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करदाताओं के लिए रिफंड प्रक्रिया और भी सरल और पारदर्शी बनाई जा सकती है।
अब सवाल यह उठता है कि वह पहले से जमा किया गया CGST/SGST कब तक रिफंड ले सकता है?
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कर विभाग पहले कहता था कि समय गिनती पहले भुगतान की तारीख से होगी।
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पर पटना हाई कोर्ट ने साफ कहा कि लिमिटेशन सही हेड में भुगतान की तारीख से गिनी जाएगी।
यानी व्यापारी को पूरा समय मिलेगा और उसका हक नहीं छीना जाएगा।
पटना हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय कर व्यवस्था में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जा सकता है। यह न केवल कानून की स्पष्ट व्याख्या करता है बल्कि करदाताओं के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करता है।
मुख्य बिंदु:
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जीएसटी रिफंड की लिमिटेशन अवधि सही हेड में भुगतान की तारीख से शुरू होगी।
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करदाताओं को अब स्पष्ट मार्गदर्शन मिल गया है।
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व्यापारिक माहौल में विश्वास और पारदर्शिता बढ़ेगी।
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आने वाले समय में यह फैसला पूरे देश में जीएसटी प्रशासन की दिशा तय कर सकता है।
इस प्रकार, यह निर्णय करदाताओं और व्यापारियों के लिए एक बड़ा सकारात्मक कदम है जो भारत की कर प्रणाली को और अधिक न्यायपूर्ण और भरोसेमंद बनाएगा।

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